शिवलिंग शिव का निराकर रूप है इसलिए शिवलिंग की पूजा का महत्व है

18_10_2016-shivling

ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में 10वें मंडल के 129वें सूक्त में उल्लेखित है, ‘शिवलिंग का संबंध ब्रह्मांड की उत्पत्ति के साथ है।’ यह सूक्त ब्रह्माण्ड के निर्माण के बारे में काफी सटीक तथ्य बताता है।

दरअसल, शिलविंग भगवान शिव का आदि-अनादी स्वरुप है। शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे शिवलिंग’ कहा गया है। स्कन्द पुराण में उल्लेखित है, ‘आकाश स्वयं लिंग है।’ धरती आधार है और यह सब कुछ अनन्त शून्य से उत्पन्न हुए हैं।

और इनमें लय होने के कारण इसे लिंग कहा गया है। हिंदू पुराणों में शिवलिंग को कई नामों से संबोधित किया गया है। जोकि क्रमशः प्रकाश स्तंभ/लिंग, अग्नि स्तंभ/लिंग, उर्जा स्तंभ/लिंग, और

ब्रह्माण्डीय स्तंभ/लिंग।

विद्येश्वर संहिता में वर्णित है कि शिव का जन्म नहीं हुआ है, इसलिए शिव अनंत समय तक मौजूद रहेंगे। शिव निराकार हैं और शिवलिंग शिव का निराकर रूप है। इसलिए शिवलिंग की पूजा का महत्व है।

पौराणिक ग्रंथों में शिवलिंग के बारे काफी विस्तार से बताया गया है तो वहीं शिवलिंग की मौजूदगी के ऐतिहासिक प्रमाण भी मिलते हैं। दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में शुमार हड़प्पा और मोहनजोदाड़ो की खुदाई से पत्थर के बने कई शिवलिंग मिले हैं।

यहां एक मूर्ति ऐसी मिली है जिसके गर्भ से पौधा निकलते हुए दिखाया गया है। यह प्रमाण है कि आरंभिक सभ्यता के लोग शिव के उपासक और प्रकृति-पूजक थे।

source http://www.jagran.com/

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